साई व्हाइब्रियोनिक्स पत्रिका

" जब आप किसी हतोत्साहित, निराष या रोग ग्रस्त व्यक्ति को देखते हो, वहीं आपका सेवा क्षेत्र है " Sri Sathya Sai Baba
Hands Reaching Out

दिव्य चिकित्सक के दिव्य वचन

Vol 17 अंक 5
सितंबर/अक्टूबर 2026


 “गीता के 17वें अध्याय में मनुष्य द्वारा ग्रहण किए जाने वाले तीन प्रकार के “आहार” के स्वभाव और प्रभाव को स्पष्ट रूप से बताया गया है। जो आहार प्रेम, सद्गुण, शक्ति, प्रसन्नता और सौहार्द को बढ़ावा देता है, वह सात्त्विक आहार है। जो आहार उत्तेजना, चंचलता और उग्रता उत्पन्न करता है तथा भूख और प्यास को बढ़ाता है, वह राजसिक आहार है। जो आहार मन को उदास एवं भारी करता है, जीवन में अव्यवस्था उत्पन्न करता है और रोगों को जन्म देता है, वह तामसिक आहार कहलाता है। इसके अतिरिक्त, भोजन करते समय हमारे साथ रहने वाले लोगों की संगति, भोजन करने का स्थान, जिस बर्तन में भोजन पकाया जाता है, तथा भोजन पकाने और परोसने वाले व्यक्ति के मन में उठने वाली भावनाएँ और विचार—इन सभी का भोजन पर सूक्ष्म प्रभाव पड़ता है। ये सभी सूक्ष्म प्रभाव उस भोजन को ग्रहण करने वाले व्यक्ति के स्वभाव, मनोभावों और भावनाओं को भी प्रभावित करते हैं।.”

…Sathya Sai Baba, “Forms of food”, Divine Discourse, January 1990  https://saispeaks.sathyasai.org/discourse/forms-food

 

“आपको यह समझना चाहिए कि जीवन निःस्वार्थ सेवा के लिए है, स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों के लिए जीने के लिए नहीं। केवल ऐसी सेवा के माध्यम से ही मानव-एकता का अनुभव किया जा सकता है। निःस्वार्थ सेवा ही कर्मयोग (कर्म के माध्यम से ईश्वर के प्रति समर्पण) का मुख्य आधार है। योग का आधार है—निःस्वार्थ सेवा के माध्यम से मन और शरीर को अनुशासित करना। समाज उन्हीं व्यक्तियों का सम्मान करता है जो समाज की सेवा करते हैं। ऐसे व्यक्ति ईश्वर की कृपा के पात्र बनते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को निःस्वार्थ सेवा के सर्वोपरि महत्व को समझना चाहिए।सेवा की भावना के साथ त्याग और बलिदान के लिए तत्परता भी होनी चाहिए। तभी उसे वास्तविक निःस्वार्थ सेवा कहा जा सकता है—ऐसी सेवा, जिसमें किसी भी प्रकार के स्वार्थ का लेश मात्र भी न हो।”

…Sathya Sai Baba, Discourse at All India Sai Active Workers Conference, 1 Nov 1987, SSS Vol 20, 1987

https://saispeaks.sathyasai.org/discourse/born-serve