दिव्य चिकित्सक के दिव्य शब्द
Vol 17 अंक 3
मई-जून 2026
“इंसान न सिर्फ़ इस जन्म में, बल्कि पिछले जन्मों में भी जाने-अनजाने कई गलत कार्य करता है। इन कार्यों की छाप 'चित्त' (याददाश्त) पर कई जन्मों तक बनी रहती है। जब मन का आईना इतना मैला हो जाता है, तो वह किसी भी चीज़ को उसके असली रूप में नहीं देख पाता। इसीलिए इंसान अपने असली स्वभाव को पहचान नहीं पाता। इसलिए, मन के आईने पर जमी गंदगी को साफ़ करना ज़रूरी है। यह कैसे किया जाए? अपने खान-पान और मनोरंजन की आदतों को सही करके। यह पक्का करना ज़रूरी है कि जो खाना खाया जा रहा है, वह सही और ईमानदार तरीकों से मिला हो। आज इंसान जिन कई परेशानियों से जूझ रहा है, उनकी वजह यह है कि जो चीज़ें वे इस्तेमाल करते हैं, वे गलत तरीकों से हासिल की गई होती हैं।”
…Sathya Sai Baba, “Purity of the mind”, Divine Discourse 25 May 1990
https://saispeaks.sathyasai.org/discourse/purity-mind-role-senses
“अपने द्वारा की जाने वाली किसी भी सेवा गतिविधि के लिए स्वयं को ही उसका कर्ता मानना एक भूल है। ऐसा कभी नहीं होना चाहिए। वास्तव में, आप जो भी सेवा कार्य करते हैं, वे आपकी अपनी उन्नति के लिए होते हैं। ये सेवा कार्य आत्मविश्वास, आत्म-संतुष्टि, आत्म-त्याग और अंततः आत्म-साक्षात्कार के उद्देश्य से किए जाने चाहिए। इस प्रकार, सेवा की भावना स्वयं के भीतर से विकसित होती है।”
…Sathya Sai Baba, Divine Discourse, Understand the Spirit of Service, 11 April 2005
https://sssbpt.info/ssspeaks/volume38/sss38-08.pdf